अगस्त 2020 के बाद हर महीने मौसम का रिकॉर्ड तोड़ रही है दिल्ली, जलवायु परिवर्तन का है प्रभाव? – Hindustan

पूरी दुनिया पर जलवायु संकट गहरा रहा है। कई वैज्ञानिक लंबे समय से इसके प्रति जागरुकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। कई विश्लेषक इससे होने वाले खतरे के प्रति भी आगाह भी कर चुके हैं। अब यह हमारे जीवन में साफतौर पर दिखने लगा है। बता दें कि दिल्ली में भी इसका असर देखने को मिला है। मौसम विभाग का डेटा दिखाता है कि अगस्त 2020 से दिल्ली कम-से-कम हर महीने एक मौसम का रिकॉर्ड तोड़ती आ रही है। मौसम अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने कहा कि मौसम के यह नए-नए रिकॉर्ड बनना राजधानी में (और उसके आसपास) अस्थायी वायुमंडलीय घटनाओं का परिणाम है, मौसम के पैटर्न के बदलाव के पीछे जलवायु संकट की बड़ी भूमिका साफ नजर आती है।

अगस्त 2020 में दिल्ली में 236.5 मिमी बारिश दर्ज की गई जो 2013 के बाद से सबसे अधिक थी। मौसम अधिकारियों ने यह भी देखा कि कुल बारिश की केवल 50 प्रतिशत बारिश दो दिनों में ही देखी गई, 12 अगस्त को 68.2 मिमी और 20 अगस्त को 54.8मिमी बारिश हुई।

सितंबर में दिल्ली ने लगभग दो दशकों में अपना सबसे गर्म महीना रिकॉर्ड किया था। उस महीने राजधानी का औसत अधिकतम तापमान 36.2 डिग्री सेल्सियस था, जिसने 2015 में 36.1 डिग्री सेल्सियस के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। इससे पहले दिल्ली मे सितंबर, 2001 में अपना उच्च औसत तापमान रिकॉर्ड किया था। जब तापमान 36.3 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया था।

जबकि अक्टूबर और नवंबर में स्थिति इसके उलट थी। ये दोनों महीने ज्यादा ठंडे थे। अक्टूबर में, दिल्ली ने 58 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया, जब न्यूनतम तापमान केवल 17.2 डिग्री सेल्सियस देखा गया। नवंबर ने इससे भी पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया,जब महीने का औसत न्यूनतम तापमान 10.2 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया, ऐसा पिछली बार 1949 में देखा गया था। जब नवंबर का औसत न्यूनतम तापमान 1938 में 9.6 डिग्री सेल्सियस था।

सामान्य से अधिक ठंड का यह सिलसिला दिसंबर और जनवरी के महीनों में भी जारी रहा, दिसंबर में आठ तथाकथित शीत लहर के दिन देखे गए, जो 1965 के बाद से सबसे अधिक है। जनवरी में 2008 के बाद से सबसे अधिक शीत लहर के दिन दर्ज किए गए (सात दिन) और जनवरी ने 21 सालाों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए (56.6 मिमी) सबसे ज्यादा बारिश देखी।

आईएमडी के क्षेत्रीय मौसम पूर्वानुमान केंद्र के प्रमुख कुलदीप श्रीवास्तव ने कहा कि अक्टूबर और जनवरी के बीच ये चरम मौसम की रिकॉर्डिंग दिल्ली के ऊपर से गुजरने वाले कम पश्चिमी विक्षोभ का तत्काल प्रभाव थी। पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर के ऊपर उत्पन्न होने वाले चक्रवाती तूफान हैं जो उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत में मौसम को प्रभावित करते हैं।

कुलदीप श्रीवास्तव ने कहा , “पिछली सर्दियों में हमने क्षेत्र में कम पश्चिमी विक्षोभ गतिविधियों के कारण सामान्य से कम तापमान दर्ज किया। आमतौर पर अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर और जनवरी के महीनों में, हमें हर महीने लगभग पांच से छह सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ मिलते हैं लेकिन पिछले साल हमें केवल दो से तीन मिले थे।”

फरवरी में मौसम की स्थिति फिर बदल गई. पिछले साल की फरवरी 120 सालों में सबसे गर्म रही. इसका औसत अधिकतम तापमान27.9 डिग्री सेल्सियस रहा. मार्च में 76 वर्षों में सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया, जिसमें पारा स्तर 29 मार्च को 40.1 डिग्री सेल्सियस को छू गया।

फरवरी और मार्च की प्रचंड गर्मी के बाद, अप्रैल में स्थितियां फिर से बदल गईं और कम से कम एक दशक में सबसे कम न्यूनतम तापमान 4 अप्रैल को 11.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।
आईएमडी के अनुसार मई ने कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़े। 19-20 मई को चक्रवाती तूफान ताउते के प्रभाव में दिल्ली ने 119.3 मिमी बारिश दर्ज की जिसके बाद मई ने एक दिन में होने वाली महीने की अब तक की सबसे अधिक बारिश का रिकॉर्ड तोड़ दिया। 

तेज हवाओं और तेज बारिश ने भी तापमान को नीचे ला दिया, जिसने अब तक के सबसे कम अधिकतम तापमान का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मौसम में इस तरह के बदलावों को देखते हुए मौसम विज्ञानियों ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में इस क्षेत्र में चरम मौसम की प्रवृत्ति विशेष रूप से स्पष्ट हुई है। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट की भूमिका साफ है।

स्काईमेट वेदर सर्विसेज के वाइस प्रेसिडेंट महेश पलावत ने कहा कि इस तरह के चरम मौसम की स्थिति न केवल दिल्ली के लिए बल्कि देश के कई अन्य हिस्सों में भी देखी जा रही है। दिल्ली के लिए, मई आमतौर पर अत्यधिक शुष्क गर्मी और उच्च तापमान वाला महीने होता है और यह एख नया रिकॉर्ड है कि इस महीने में एक भी हीट वेव नहीं देखी गई है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान स्कूल के एपी डिमरी ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह का चरम मौसम देखकर मालूम होता है कि इसपर जलवायु संकट का साफ प्रभाव है।

पलावत ने कहा, “पिछले दो से तीन सालों में भारत के कई हिस्सों में कई रिकॉर्ड तोड़े जा रहे हैं। हम देख रहे हैं कि चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। पिछले तीन सालों में, हमने यह भी देखा है कि भारत के तटों से टकराने वाले चक्रवातों की तीव्रता भी बढ़ रही है। यह सब भी जलवायु संकट का प्रभाव है। ”

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