Chandrayaan2: इतिहास रचने को भारत तैयार, प्रक्षेपण देखने के लिए जुटने लगे लोग

Publish Date:Mon, 15 Jul 2019 01:59 AM (IST)

नई दिल्‍ली, जेएनएन। Chandrayaan2 भारत ने अंतरिक्ष की दुनिया में एक और उपलब्धि की ओर कदम बढ़ा दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation, ISRO) के चंद्रयान-2 के लिए काउंटडाउन शुरू हो गया है। रविवार सुबह छह बजकर 51 मिनट से शुरू होकर यह काउंटडाउन 20 घंटे चलेगा। इसरो का सबसे भारी रॉकेट जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लांच व्हीकल-मार्क 3 (जीएसएलवी-एमके3) यान को लेकर रवाना होगा। यह 15 जुलाई को तड़के 2 बजकर 51 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन सेंटर से लॉन्च होगा। काउंटडाउन के दौरान रॉकेट और यान के पूरे सिस्टम को जांचा जाएगा। साथ ही रॉकेट में ईंधन भी भरा जाएगा। आइये जानते हैं इस मिशन से जुड़ी खास बातें…

चांद पर यान उतारने वाला चौथा देश बन जाएगा भारतChandrayaan2 की लांचिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन प्रक्षेपण केंद्र से होगी। अभियान की सफलता के साथ ही चांद पर यान उतारने वाला भारत चौथा देश बन जाएगा। इससे पहले अमेरिका, चीन और रूस अपने यान चांद पर उतार चुके हैं। भारत ने 2008 में चंद्रयान-1 भेजा था, जिसने 10 माह तक चांद की परिक्रमा करते हुए प्रयोगों को अंजाम दिया था। चांद पर पानी की खोज का श्रेय इसी अभियान को जाता है। इसरो प्रमुख (ISRO chairperson) डॉ. के सिवन (Dr K. Sivan) ने बताया कि इस मिशन की सारी प्रक्रियाएं सुचारू रूप से जारी हैं। 

लैंडिंग के 15 मिनट बेहद मुश्किल तिरुमला में शनिवार को भगवान वेंकटेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद इसरो के अध्यक्ष के सिवन ने कहा कि चंद्रयान-2 प्रौद्योगिकी में अगली छलांग है क्योंकि हम चांद के दक्षिणी ध्रुव के समीप सॉफ्ट लैंडिंग कराने का प्रयास कर रहे हैं। सॉफ्ट लैंडिंग बेहद जटिल होती है। लैंडिंग के दौरान हम लगभग 15 मिनट के खतरे का सामना करेंगे। लॉन्चिंग के दौरान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद श्रीहरिकोटा में प्रक्षेपण होते हुए देखेंगे। स्वदेशी तकनीक से निर्मित चंद्रयान-2 में कुल 13 पेलोड हैं। इनमें पांच भारत के, तीन यूरोप, दो अमेरिका और एक बुल्गारिया के हैं। आठ पेलोड ऑर्बिटर में, तीन लैंडर विक्रम में जबकि दो रोवर प्रज्ञान में मौजूद रहेंगे।  
15 मंजिल ऊंचा है बाहुबली 640 टन वजनी जीएसएलवी मार्क-III (GSLV MK-III) रॉकेट को तेलुगु मीडिया ने ‘बाहुबली’ तो इसरो ने ‘फैट बॉय’ (मोटा लड़का) नाम दिया है। 375 करोड़ की लागत से बना यह रॉकेट 3.8 टन वजनी चंद्रयान-2 को लेकर उड़ेगा। चंद्रयान-2 की लागत 603 करोड़ है। इसकी ऊंचाई 44 मीटर है जो कि 15 मंजिली इमारत के बराबर है। यह रॉकेट चार टन वजनी सेटेलाइट को आसमान में ले जाने में सक्षम है। इसमें तीन चरण वाले इंजन लगे हैं। अब तक इसरो इस श्रेणी के तीन रॉकेट लांच कर चुका है। 2022 में भारत के पहले मानव मिशन में भी इसी रॉकेट का इस्तेमाल किया जाएगा। चंद्रयान-2 के 6 या 7 सितंबर को चांद की सतह पर उतरने का अनुमान है। 16 मिनट की उड़ान के बाद रॉकेट इस यान को पृथ्वी की बाहरी कक्षा में पहुंचा देगा। फिर इसे चांद की कक्षा तक पहुंचाया जाएगा। 

ऐसा होगा चांद तक का सफर चंद्रयान-2 के चांद तक पहुंचने में 54 दिन लगेंगे। इसके 6 या 7 सितंबर को चांद की सतह पर उतरने का अनुमान है। 16 मिनट की उड़ान के बाद रॉकेट इस यान को पृथ्वी की बाहरी कक्षा में पहुंचा देगा। इसके बाद 16 दिनों तक यह धरती की परिक्रमा करते हुए चांद की ओर बढ़ेगा। इस दौरान इसकी रफ्तार 10 किलोमीटर/प्रति सेकंड होगी। 16 दिन बाद चंद्रयान-2 से रॉकेट अलग हो जाएगा। फिर इसे चांद की कक्षा तक पहुंचाया जाएगा। चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद यह चंद्रमा का चक्‍कर लगाने लगेगा। यह चांद का चक्‍कर लगाते हुए उसकी सतह की ओर बढ़ेगा। चांद की सतह पर पहुंचने के बाद लैंडर और रोवर 14 दिनों तक जानकारियां जुटाते रहेंगे। 

चंद्रयान-2 के हैं तीन हिस्सेचंद्रयान-2 के तीन हिस्से हैं ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर। अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के सम्मान में लैंडर का नाम विक्रम रखा गया है। वहीं रोवर का नाम प्रज्ञान है, जो संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ज्ञान। चांद की कक्षा में पहुंचने के चार दिन बाद लैंडर-रोवर अपने ऑर्बिटर से अलग हो जाएंगे। विक्रम छह सितंबर को चांद के दक्षिणी ध्रुव के नजदीक उतरेगा और वहां तीन वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देगा। चांद पर उतरने के बाद रोवर उससे अलग होकर 14 दिन तक अन्य प्रयोगों को अंजाम देगा। चांद के हिसाब से यह अवधि एक दिन की बनेगी। वहीं ऑर्बिटर सालभर चांद की परिक्रमा करते हुए आठ प्रयोग करेगा। इस पूरे अभियान में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी एक प्रयोग को अंजाम देगी।
चांद के अनछुए हिस्से पर पहुंचेगा यान चंद्रयान-2 अपनी तरह का पहला मिशन है जो चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के उस क्षेत्र के बारे में जानकारी जुटाएगा जो अब तक अछूता है। यह चांद के जिस दक्षिणी ध्रुव वाले क्षेत्र में उतरेगा, वहां अब तक किसी देश ने अभियान को अंजाम नहीं दिया है। यह अभियान इस हिस्से को समझने और चांद के विकासक्रम को जानने में मददगार होगा। क्षेत्र में कई विशाल क्रेटर (अंतरिक्षीय पिंडों के टकराने से बने गड्ढे) हैं, जिनमें सौर व्यवस्था के बहुत शुरुआती समय के प्रमाण मिलने की उम्मीद है। इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने बताया कि अभियान में 30 फीसद महिलाओं ने भूमिका निभाई है। प्रोजेक्ट डायरेक्टर एम. वनिता और मिशन डायरेक्टर रितु करिधल हैं। 

विदेशी मीडिया ने बेहद जटिल मिशन बताया ‘द वाशिंगटन पोस्‍ट’ ने इस मिशन को बेहद जटिल बताया है। विशेषज्ञों ने कहा है कि यह मिशन चांद की सतह का नक्शा तैयार करने में मददगार होगा। इस मिशन के जरिए वैज्ञानिक चांद पर मैग्नीशियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, कैल्शियम, टाइटेनियम, आयरन और सोडियम जैसे तत्‍वों की मौजूदगी का पता लगाएंगे। सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि इसके जरिए चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र के गड्ढों में बर्फ के रूप में जमा पानी का भी पता लगाने की कोशिश की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम पर भारत का जोर अपनी युवा आबादी की आकांक्षाओं को दर्शाता है।
चुनौतियां भी कम नहीं धरती से चांद करीब 3,844 लाख किमी दूर है इसलिए कोई भी संदेश पृथ्‍वी से चांद पर पहुंचने में कुछ मिनट लगेंगे। यही नहीं सोलर रेडिएशन का भी असर चंद्रयान-2 पर पड़ सकता है। वहां सिग्नल कमजोर हो सकते हैं। करीब 10 साल पहले अक्टूबर 2008 में चंद्रयान-1 लॉन्च हुआ था। इसमें एक ऑर्बिटर और इम्पैक्टर था लेकिन रोवर नहीं था। चंद्रयान-1 चंद्रमा की कक्षा में गया जरूर था लेकिन वह चंद्रमा पर उतरा नहीं था। यह चंद्रमा की कक्षा में 312 दिन रहा। इसने चंद्रमा के कुछ आंकड़े भेजे थे। बता दें कि चंद्रयान-1 के डेटा में ही चंद्रमा पर बर्फ होने के सबूत पाए गए थे। 
Posted By: Krishna Bihari Singh

Source: Jagran.com

Related posts

Leave a Comment