Budget and Expectations: अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार के बीच संतुलन साधने की चुनौती

Publish Date:Sun, 30 Jun 2019 12:19 PM (IST)

विवेक कौल। आने वाले शुक्रवार को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण इस वित्तीय वर्ष का आम बजट संसद में पेश करेंगी। मुश्किल यह है कि सरकारी वित्त की हालत थोड़ी डांवाडोल है। उसके ऊपर इस साल की शुरुआत से अर्थव्यवस्था ढीली पड़ती दिख रही है। सरकार की कमाई लक्ष्य से पीछे रह रही है। सुस्त अर्थव्यवस्था में तेजी के लिए व्यापक पैमाने पर खर्चे जरूरी हैं। नाजुक स्थिति वाली अर्थव्यवस्था में सरकार का करों के पीछे भागना भी जायज नहीं। ऐसे में संतुलन साधने की बड़ी चुनौती है।
करों में भारी बढ़ोत्‍तरी की आशंका कम अगर पिछले वित्तीय वर्ष का उदाहरण लिया जाए, सरकार पांच बड़े करों (कॉरपोरेशन टैक्स, आयकर, माल और सेवा कर, संघ उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क) से करीब 21.26 लाख करोड़ रुपये कमाने की आशा रख रही थी, पर अंत में केवल 19.32 लाख करोड़ रुपये ही कमा पाई। यह लक्ष्य से 1.94 लाख करोड़ रुपये या 9.1 फीसद कम था। इस वित्तीय वर्ष की शुरुआत कुछ कमजोर रही है। अगर आर्थिक संकेतकों (जैसे गाड़ी और दोपहिया वाहनों की बिक्री, ट्रैक्टरों की बिक्री, वगैरह) को देखा जाए तो ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले साल से और भी ज्यादा कमजोर पड़ गयी है। ऐसी स्थिति में सरकार करों में उच्च वृद्धि की आशा नहीं कर सकती है। इस बात का अंदाजा गत फरवरी में पेश अंतरिम बजट को देख कर लगाया जा सकता है।

सरकार को अपना खर्चा बढ़ाना चाहिएयदि सरकार को अंतरिम बजट में अनुमानित आयकर को कमाना है, तो 2019-20 में एकत्र किए गए आयकर को पिछले साल से 34 फीसद ज्यादा होना होगा। केंद्रीय माल और सेवा कर के मामले में, एकत्र किए गए कर को एक तिहाई तक बढ़ाना होगा। सीमा शुल्क के मामले में यह वृद्धि 23 फीसद से अधिक होनी चाहिए। ये सब उस परिस्थिति में करना होगा जब व्यापक रूप से अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। दूसरी तरफ व्यापारियों और काफी नीति निर्माताओं का ये मानना है कि सरकार को इस साल अपना खर्चा बढ़ाना चाहिए। इससे धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचेगा। जब सरकार ज्यादा पैसा खर्च करेगी तो इससे किसी न किसी की आमदनी बढ़ेगी। जिसकी आमदनी बढ़ेगी वो भी पहले से ज्यादा पैसे खर्च करेगा और इससे एक चक्र बनेगा जिसे अर्थशास्त्री मल्टीप्लायर इफेक्ट कहते हैं।
कमाने भी पड़ेंगे ज्यादा पैसे मल्टीप्लायर इफेक्ट से अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचेगा और वह पहले से तेज रफ्तार से आगे बढ़ेगी। अगर सरकार ज्यादा पैसे खर्च करेगी तो उसे ज्यादा पैसे कमाने भी पड़ेंगे। जैसा कि हमने पहले देखा, इस साल सरकार का करों से ज्यादा कमाई करना नजर नहीं आ रहा है। ऐसे माहौल में जहां अर्थव्यवस्था नाज़ुक स्थिति में है, सरकार का ज्यादा करों के पीछे भागना, अर्थव्यवस्था को और भी नुकसान पहुंचा सकता है। तो सरकार क्या कर सकती है? सरकार के पास ज्यादा उधार लेकर ज्यादा पैसे खर्चे करने का विकल्प हमेशा रहता है, पर यहां एक समस्या पैदा हो सकती है, या फिर यह कहा जाय कि समस्या पैदा हो चुकी है। जब सरकार ज्यादा पैसे उधार लेती है तो बाकी लोगों को उधार लेने के लिए पैसे कम पड़ जाते हैं। इसलिए ब्याज दरें बढ़ जाती हैं। इसे अर्थशास्त्री क्राउडिंग आउट इफेक्ट कहते हैं। भारत इस समस्या से अभी जूझ रहा है।

ज्यादा उधारी से चढ़ेंगी ब्‍याज दरें सरकार का मतलब केवल केंद्रीय सरकार नहीं होता है। राज्य सरकारें भी उधार लेती हैं। इसके अलावा कई सारे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम भी उधार लेते हैं। इस पूरे उधार को पब्लिक सेक्टर बारोइंग रिक्वायरमेंट कहा जाता है। पिछले साल यह सकल घरेलू उत्पाद का 8.5 फीसद हिस्सा था, जो बहुत ज्यादा है। एक तो करेला दूसरे नीम चढ़ा के तहत स्थिति यह हो रही है कि पिछले कुछ सालों से घरेलु बचत भी कम हो रही है। ऐसे माहौल में अगर सरकार और भी ज्यादा उधार लेगी तो फिर ब्याज दरें कम नहीं हो सकतीं। तो उपाय क्या है?
जमीन के मुद्रीकरण की जरूरत भारत सरकार के कई औसत दर्जे के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सरकारी पूंजी के करोड़ों रुपये अनावश्यक रूप से अवरुद्ध पड़े हैं। इसके ऊपर इन उद्यमों के पास बहुत सारी जमीन है, जो खाली पड़ी हुई है। इस भूमि का मुद्रीकरण करने की आवश्यकता है और इस प्रकार उठाया गया धन एक कोष में जा सकता है। जिससे बुनियादी ढांचे के विकास के खर्च का प्रबंध हो सकता है। बाकी सरकारी खर्चे को भी जमीन बेचकर उठाया जा सकता है। इसके अलावा ये भी जरूरत है कि काफी उद्यमों को बंद किया जाए और इनके पीछे और पैसा नहीं बर्बाद किया जाए। इन पैसों की देश के विकास में बहुत जरूरत है। देखना यह दिलचस्प होगा कि प्रतिकूल परिस्थितियों में देश की पहली महिला वित्त मंत्री संतुलन कैसे साधती हैं।(लेखक अर्थशास्‍त्री और इजी मनी ट्राइलॉजी के लेखक हैं)  
Posted By: Krishna Bihari Singh

Source: Jagran.com

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