जो वोट नहीं देते उन्‍हें सरकार से सवाल करने का हक नहीं, इसलिए मतदान अवश्‍य करें

Publish Date:Thu, 11 Apr 2019 03:44 PM (IST)

नई दिल्ली, कमलेश रघुवंशी। Lok Sabha Election 2019: आम चुनाव के प्रथम चरण के लिए मतदान प्रक्रिया शुरू होने के साथ लोकसभा चुनाव का आगाज हो चुका है। उम्‍मीद है कि इस बार मतदान का प्रतिशत पिछले आम चुनावों के मुकाबले बढ़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत तमाम प्रमुख लोगों ने मतदाताओं से लोकतंत्र के इस महाउत्‍सव में बढ़चढ़कर भाग लेने की अपील की है। खासकर इस बार युवा मतदाताओं से काफी उम्‍मीदें हैं। देखा जाए तो चुनाव आयोग भी इसके लिए हर चुनाव में अपने स्‍तर पर प्रयास करता है, लेकिन इसके बावजूद ऐसे लोगों की संख्‍या काफी ज्‍यादा है जो मतदान नहीं करते।
लोकतंत्र के लिए समस्या हैं वोट न करने वालेचुनाव में कम मतदान चिंता की बात है। हमारे लोकतंत्र में सबको समान मताधिकार है। चाहे अमीर का हो या गरीब का, सबके वोट की कीमत एक है। आपका एक वोट देश में बदलाव ला सकता है। इस बार चूक गए तो अगला मौका पांच साल बाद ही मिल पाएगा। वैसे भी जो लोग वोट नहीं देते, उनको सरकार से सवाल करने का कोई हक नहीं है। आमतौर पर देखने में आता है कि जो लोग वोट नहीं देते, वे ही राजनीति और राजनेताओं पर टिप्‍पणी ज्‍यादा करते हैं। ऐसे लोग हमारी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के लिए गंभीर समस्‍या हैं।

टापुओं में बंटे राजनीतिक दल लोकतंत्र के लिए खतरालोकतंत्र का मतलब है, जनता के लिए जनता का शासन। हमें सरकार व जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? क्या हम लोकतंत्र के प्रति अपने अधिकारों व क‌र्त्तव्य को लेकर सजग हैं? यह एक बड़ा सवाल है। लोकतंत्र में किसी भी देश को सरकार व जनप्रतिनिधि वैसे ही मिलते हैं, जैसा उसका समाज होता है। समाजिक स्‍तर में आई गिरावट की वजह से ही राजनीतिक दल हमें जाति और धर्म के खांचे में विभाजित कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। कुछ दलों को छोड दिया जाए तो टुकडियों में बंटे और अपने–अपने टापुओं पर डटे राजनीतिक दल और उसके नेता देश के लोकतंत्र को नुकसान ही पहुंचा रहे हैं।
खरे-खोटे उम्मीदवार की शिनाख्त आपकी जिम्मेदारीवर्तमान में देश की जो राजनीतिक हालत है, उसके लिए केवल राजनीतिक दल व राजनेता ही दोषी नहीं हैं। कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हें संसद में पहुंचाने का काम तो हम ही करते हैं, कभी वोट डालकर कभी उदासीन रह कर। जो मतदान करते भी हैं वे अपनी क्षणिक सुविधा के लिए देश का दीर्घकालिक हित नहीं देखते। जो नहीं करते उनका मानना है कि सरकार चाहे किसी भी दल की बने उनकी स्थिति में विशेष बदलाव आने वाला नहीं है। हालांकि, ऐसा करके वे एक तरह से अप्रत्यक्ष रूप से अयोग्य उम्मीदवारों की मदद ही करते हैं। चुनाव के प्रति जनता की उदासीनता लोकतंत्र के लिए शुभलक्षण नहीं है। सच तो यह है कि खरे-खोटे की शिनाख्त करने की जिम्मेदारी लोकतंत्र में सिर्फ जनता की है। सोचिए, आखिर आपका चुनाव बदलाव क्यों नहीं ला पाता।

गलती हमारे फैसलों की ही हैबहुदलीय व्‍यवस्‍था में होना यह चाहिए कि नीति के नाते दल व व्यक्तित्व के नाते व्यक्ति को चुना जाए। समय आ गया है, जब देश के हर नागरिक को यह सोचना होगा कि आखिर क्यों उनका नुमाइंदा दागदार है? सीधी सी बात है कि किसी भी नेता के चरित्र को देखकर उसके पीछे चलने वालों के चरित्र का आकलन किया जा सकता है। तो क्या मुट्ठी भर दागदार लोग देश की सवा सौ करोड़ आबादी के चरित्र पर धब्बा लगा रहे हैं? क्या जिस लोकतंत्र के प्रति देश का हर खासो-आम श्रद्धा का भाव रखता है, वह ऐसा ही होना चाहिए? जिन्हें हम चुनकर संसद में भेजते हैं क्या वह हमारी अपेक्षा के अनुरूप देश को चला पाएंगे? यदि नहीं तो फिर निश्चित रूप से गलती है हमारे फैसलों में। हम जिन लोगों को चुन कर भेजते हैं उन्हें अपने सारे अधिकार सौंप देते हैं। अधिकार सौंपने से पहले विचार भी नहीं करते कि कितना अहम फैसला लेने जा रहे हैं। एक ही तरह की गलती बार-बार करते जा रहे हैं और उसका नतीजा हर बार पहले से कुछ अधिक दुखदायी सिद्ध होता है। हम व्यवस्था और तंत्र का रोना अवश्य रोते हैं, किंतु अपने गिरेबान में झांक कर कभी नहीं देखते। कभी उन कारणों की तलाश नहीं करते जो व्यवस्था में इस गड़बड़ी के कारक हैं। क्या यह अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराने जैसा नहीं है?
युवाओं को लेना होगा फैसलाआखिर कब तक चलता रहेगा यह सब और इस खुशफहमी में कब तक जीते रहेंगे कि हम देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के नियंता हैं? जबकि लोकतंत्र के नाम पर चुनकर ऐसे लोग भी संसद तक पहुंच जाते हैं, जिनके दामन दागदार हैं। अब वक्त आ गया है जब हम आत्ममंथन करें और देखें कि इस सबके लिए हम कितने जिम्मेदार हैं। जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि यह व्यवस्था हमारी ही गलतियों का परिणाम है, उस दिन हम इसे आसानी से बदल देंगे। खासकर युवाओं को इस काम में महती भूमिका निभानी होगी। युवा गलत बातों को तब तक नहीं पसंद करते, जब तक कि वह उनके परिवेश का हिस्सा न बन गई हो और वे उन बातों के अभ्यस्त न हो गए हों। प्राकृतिक रूप से युवा बुराई से नफरत करने वाले होते हैं। देश और समाज में मौजूद कुछ बुराइयों से मुक्ति पाई जा सकती है, बशर्ते युवा इस बात का अहसास करें कि उन्हें इस बदलाव का नेतृत्व करना है। युवाओं को बस एक फैसला भर तो लेना है कि वे अब चुप नहीं बैठेंगे, सब कुछ ऐसे ही नहीं चलने देंगे। वैसे भी यह जनता का फर्ज है कि वह जो भी फैसला करे पूरे माप-तौल के बाद करे। ऐसे लोगों को चुने जो देश का हित करने वाले हों। व्यवस्था तब बदलेगी जब हम सही फैसला करें।
 (लेखक जागरण डॉट काम के संपादक हैं)
Posted By: Digpal Singh

Source: Jagran.com

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