जानिए- इस भारतीय राजा की कहानी, जो हर 5वें साल सबकुछ कर देता था दान

Publish Date:Mon, 11 Feb 2019 02:31 PM (IST)

नई दिल्ली [सुधीर कुमार पांडेय]। कुंभ की चर्चा होती है तो कन्नौज (उत्तर प्रदेश) के राजा हर्षवर्धन ( 606 से 645 ईसवी) का भी जिक्र आता है। यह राजा अपनी दानशीलता के लिए जाना जाता था। बौद्ध धर्म अपनाने के बावजूद उसमें अन्य धर्मों के प्रति अगाध श्रद्धा थी। ऐसा कहा जाता है कि वह हर 5वें साल प्रयागराज में महामोक्षपरिषद में अपना सर्वस्व दान कर देता था। इस महामोक्षपरिषद को कुंभ के तौर पर देखा जा सकता है।
उसके समय यानी आज से करीब 1300 वर्ष पहले चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग भारत आया था, जिसे यात्रियों का राजकुमार भी कहा जाता है। उसने अपने ग्रंथ सीयूकी में भारत की धार्मिक सांस्कृतिक और सामाजिक दशा का वर्णन किया है।
इतिहासकार केसी श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत का इतिहास में इस बात का उल्लेख किया है कि उसने प्रयागराज में हर 5वें साल में आयोजित होने वाले धार्मिक उत्सव को किस रूप में देखा। ह्वेनसांग बताता है कि हर्ष के समय प्रयाग में हर पांचवें वर्ष महामोक्षपरिषद का आयोजन होता था। जिस महामोक्षपरिषद में वह उपस्थित हुआ था, उसमें 18 अधीन देशों के राजा उपस्थित हुए थे। इसमें वल्लभी और कामरूप के शासक भी थे। यह समारोह करीब 75 दिनों तक चला। हर्ष ने बुद्ध, सूर्य और शिव की प्रतिमाओं की पूजा की थी। वह यहां दीन दुखियों को काफी दान देता था। अपने बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणों को भी दान दे देता था।

ह्वेनसांग को बनाया गया था बौद्ध संगीति का अध्यक्ष
बिखरी धर्म परंपराओं को एक जगह संकलित करने के उद्देश्य से बौद्ध संगीति का आयोजन किया जाता है। पांचवीं बौद्ध संगीति का अध्यक्ष चीनी यात्री ह्वेनसांग को बनाया गया था। यह संगीति कन्नौज में हर्षवर्धन के शासनकाल में करीब 630 ईसवी में हुई थी। ह्वेनसांग ने शैव धर्म का मुख्य केंद्र काशी को बताया था। उसका कहना था कि यहां सौ शिव मंदिर हैं।

यात्रियों का राजकुमार
फाह्यान की तरह ह्वेनसांग भी चीनी बौद्ध भिक्षु था। ह्वेनसांग ने गांधार, कश्मीर, पंजाब, कपिलवस्तु, बनारस, गया एवं कुशीनगर की यात्रा की थी लेकिन भारत में सबसे महत्वपूर्ण समय कन्नौज में बीता। तब वहां का राजा हर्षवर्धन था। वह वापस चीन जाते समय कई हस्तलिखित पांडुलिपियां अपने साथ ले गया था। चीनी यात्रियों में सर्वाधिक महत्व ह्वेनसांग का ही है। उसे यात्रियों का राजकुमार कहा जाता है।

मैगस्थनीज ने कृष्ण और शिव का ऐसे उल्लेख किया
यूनानी दार्शनिक मैगस्थनीज (300 ईसा पूर्व) ने अपनी पुस्तक इंडिका में लिखा है कि सौरसेनोई क्षेत्र (सूरसेन, मथुरा) में जोबारेस (यमुना नदी) में हेराक्लीज (कृष्ण का यूनानी नाम) की पूजा का प्रचलन था। उसने डायनोसिस (शिव) की पूजा का भी उल्लेख किया।

यूनानी राजदूत ने अपने को विष्णु भगवान को समर्पित किया
बेसनगर अभिलेख (मध्य प्रदेश) में उल्लेख है कि तक्षशिला निवासी यूनानी राजदूत हेलियोडोरस शुंग शासक भागभद्र के चौदहवें वर्ष में विदिशा आया और भगवान वासुदेव (विष्णु) के सम्मान में गरुण ध्वज की स्थापना की और अपने को भागवत घोषित किया!

उच्च कोटि का नाटककार था हर्षवर्धन
द्विजेंद्रनारायण झा और कृष्णमोहन श्रीमाली की पुस्तक प्राचीन भारत का इतिहास में उल्लेख मिलता है कि हर्ष ने महायान बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया। हालांकि शैव और अन्य धर्मावलंबियों के प्रति उसने उदारता दिखाई। हर्ष उच्च कोटि का नाटककार था। हर्ष का एक संस्कृत नाटक नागानंद है, जिसमें उसने स्वयं आत्मबलिदानी बौद्ध नायक की भूमिका निभाई थी। यह पार्वती को समर्पित है। इसमें न तो उसे और न ही बौद्ध, जैन, आजीवक तथा साधुओं में धार्मिक अंतर्विरोध प्रतीत हुआ। 

Posted By: JP Yadav

Source: Jagran.com

Related posts

Leave a Comment