पेटेंट वाली दवा के लिए अनिवार्य लाइसेंस की सिफारिश, असाध्‍य बीमारियों की दवाओं की कीमतों में आएगी कमी

Publish Date:Sun, 27 Jan 2019 10:40 PM (IST)

नई दिल्ली, प्रेट्र। सरकार अगर अंतर मंत्रालयी समिति की सिफारिशों को मान लेती है तो कैंसर और अन्य असाध्य बीमारियों की पेटेंट वाली महंगी दवाइयों की कीमत कम हो सकती है। इनमें पेटेंट रखने वाली कंपनी की अनुमति के बिना ही दवाइयों के उत्पादन के लिए किसी भी भारतीय कंपनी को ‘अनिवार्य लाइसेंस’ देने का सुझाव भी शामिल है। अधिकारियों के मुताबिक सरकार समिति की रिपोर्ट पर विचार कर रही है और मार्च तक इस पर कुछ फैसला लिए जाने की उम्मीद है।
दवा विभाग द्वारा गठित संयुक्त सचिवों की अंतर-मंत्रालयी समिति ने विभिन्न देशों की क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) का विश्लेषण कर जीवन रक्षक दवाइयों की अधिकतम कीमत निर्धारित करने का भी सुझाव दिया है। ज्यादातर पश्चिमी देशों में दवाइयों की कीमत तय करने में इस प्रक्रिया को ही अपनाया जाता है।
भारत में बेचे जाने वाली ज्यादातर पेटेंट वाली दवाइयों पर बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों का एकाधिकार है। ये कंपनियां ऐसी दवाइयों की अधिकतम मूल्य सीमा तय करने और दूसरी कंपनियों को इसके उत्पादन के लिए अनिवार्य लाइसेंस देने किसी भी योजना खुलकर विरोध करती हैं। मौजूदा समय में भारत में सालाना 2.3 लाख करोड़ रुपये का दवा का कारोबार होता है। इसमें लगभग 30 फीसद हिस्सा पेटेंट दवाइयों का है, जबकि शेष धनराशि की कमाई जेनेरिक दवाइयों की बिक्री से होती है।

समिति ने कहा कि कैंसररोधी और फंगसरोधी पेटेंट दवाइयों की कीमत बहुत ज्यादा है। समिति ने उदाहरण देकर बताया है कि कैंसर के लिए इलाज में काम आने वाले एक इंजेक्शन की कीमत लगभग एक लाख रुपये है। समिति ने मधुमेहरोधी पेटेंट दवाइयों की कीमत को कम किए जाने की सिफारिश की है।
साथ ही यह भी कहा है कि अहम दवाइयों का पेटेंट रखने वाली कंपनियों को उसके उत्पादन के लिए स्वेच्छा से किसी दूसरी कंपनी को लाइसेंस देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पैनल ने यह भी कहा कि आम लोगों को न्यूनतम कीमत पर जीवन रक्षक दवाइयां मुहैया कराने के लिए सरकार को दवा कंपनियों से बातचीत कर कम दर पर दवाइयां खरीदने के विकल्पों की भी तलाश करनी चाहिए।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में पेटेंट दवाइयों की कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए एक प्रभावकारी व्यवस्था बनाना आवश्यक है। मौजूदा व्यवस्था के तहत कोई कंपनी शोध के बाद किसी दवा को तैयार करती है तो बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत उस पर उसे 20 साल के लिए पेटेंट मिल जाता है। पेटेंट मिलने के बाद कंपनी किसी दूसरी कंपनी को उस दवा का उत्पादन करने से रोक सकती है।

Posted By: Arun Kumar Singh

Source: Jagran.com

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