जींद उपचुनाव पर दांव लगाकर लोकसभा चुनाव साधने की कोशिश में राजनीतिक पार्टियां!

जींद विधानसभा उपचुनाव राजनीतिक पार्टियों के लिए राजनीतिक सम्मान की लड़ाई में तब्दील हो चुका है. आगामी लोकसभा चुनावों में इस उपचुनाव की धमक साफ सुनने को मिलेगी. यह जीत लोकसभा चुनावों के मद्देनजर निर्णायक साबित होने वाला है.जींद में सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां जीतने के लिए दमखम लगा रही हैं. इनेलो विधायक हरि चंद मिड्ढा के निधन के कारण इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है.मीड्ढा के पुत्र कृष्ण मीड्ढा बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. राज्य में बीजेपी का शासन है. मीड्ढा की बीजेपी उम्मीदवारी पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. पेशे से एक आर्युवेदिक डॉक्टर कृष्ण मीड्ढा पंजाबी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं हालांकि जींद विधानसभा में जाटों का दबदबा है.दिलचस्प बात यह है कि 1972 से ही किसी जाट नेता ने जींद का विधानसभा चुनाव नहीं जीता है. जींद में ब्राह्मण और पंजाबी समुदाय के लगभग 12,000 हजार वोट हैं. इस चुनाव में 21 उम्मीदवार उतरे हैं. इन राजनीतिक पार्टियों में बीजेपी, कांग्रेस, आईएनएलडी और जननायक जनता पार्टी(जेजेपी) पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ रहे हैं.बीजेपी के कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट से सांसद राजकुमार सैनी ने भी अपनी पार्टी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी से एक पंजाबी ब्राह्मण उम्मीदवार को विधानसभा चुनाव में उतारा है.(यह भी पढ़ें- जींद उपचुनाव: चौटाला परिवार में आपसी कलह, BJP को आंखे दिखा रहे राजकुमार सैनी)दो बार के नगर परिषद प्रमुख विनोद आसरी एलएसपी में शामिल होने से पहले कांग्रेस के नेता थे. सैनी, जो ओबीसी और पंजाबी ब्राह्मण वोटों पर राजनीति कर रहे हैं, कई पार्टियों का खेल बिगाड़ सकते हैं. जबकि राजनीतिक पंडितों ने इस सीट को सत्तारूढ़ भाजपा को लगभग सुपुर्द कर दिया था लेकिन कांग्रेस द्वारा रणदीप सिंह सुरजेवाला की उम्मीदवारी की घोषणा ने रातोंरात समीकरण बदल दिए.अब उपचुनाव एक बड़ी प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल गया है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुरजेवाला के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है. उन्हें कांग्रेस की ओर से सीएम पद का उम्मीदवार भी माना जा रहा है.कांग्रेस के नेताओं ने जिन्हें पार्टी के सीएम उम्मीदवारों के तौर पर देखा जा रहा था अब तक एक एकजुट चेहरा सामने रखा है, उनके लिए एक जीत सुरजेवाला की हार में भी देखा जा सकता है. इसी तरह, यह लोकसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के लिए प्रारंभिक परीक्षा की तरह है. क्योंकि यही चुनाव उनकी आगामी चुनावों में जिम्मेदारी तय करने वाला साबित होगा.ये भी पढे़ं:- प्रियंका गांधी की राजनीति में इंट्री से हरियाणा कांग्रेस गदगद, तो BJP ने राहुल को बताया फेलआईएनएलडी और जेजेपी के लिए यह उपचुनाव विभाजन के बाद मिले जनसमर्थन को साबित करेगा. सीट के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खट्टर ने खुद चुनाव क्षेत्र में कई रैलियां की हैं.लगभग 1.70 लाख की आबादी के साथ इस सीट पर लगभग 1.07 लाख शहरी मतदाता हैं.जिनमें से 45,000 से अधिक मतदाता जाट समुदाय के हैं. सुरजेवाला जाट समाज के बड़े नेता है. कांग्रेस ने जाट वोटों को साधने के लिए इस विधानसभा सीट से सुरजेवाला को आगे किया है.इनेलो ने उम्मेद सिंह रेडू को मैदान में उतारा है और जेजेपी दिग्विजय चौटाला को. दोनों पहली बार चुनावी समर में उतर रहे हैं. दोनों में कॉमन बात यह है कि दोनों ही जाट समुदाय से आते हैं. जींद में ओबीसी मतदाताओं की संख्या लगभग 45,000 हजार है, जबकि अनुसूचित जातियों के मतदाता 38,000 हजार की संख्या में हैं.वैश्य समुदाय जिसके पास लगभग 11,000 वोट हैं निर्णायक फैसला तय कर सकते हैं. आम आदमी पार्टी (AAP) ने जेजेपी को अपना समर्थन दिया है. आप सांसद सुशील गुप्ता भी वैश्य समाज से ही आते हैं. और जेजेपी को समर्थन देने का ऐलान भी इन्होंने ही किया था.जींद उपचुनाव के लिए मतदान 28 जनवरी को होगा, जबकि मतगणना 31 जनवरी को होगी.एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स
Source: News18 News

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