ANALYSIS: 10% सवर्ण आरक्षण लागू कराने में सवर्ण ही हैं बीजेपी की चुनौती

(भवदीप कांग)आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण बिल संबंधी 124वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास हो गया है. नए विधेयक के तहत 8 लाख से कम सालाना इनकम वाले सवर्णों को गरीब माना जाएगा. उन्हें शिक्षा व सरकारी नौकरी में 10 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा. अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा होने से सवर्णों के आरक्षण को लेकर विरोध शांत हो जाएगा? क्या मोदी सरकार इसे आसानी से लागू करवा पाएगी? क्या इसका व्यावहारिक रूप देखने को मिलेगा? या फिर सवर्ण आरक्षण महज़ एक चुनावी लॉलीपॉप बनकर रह जाएगा.आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र अगर देखा जाए, तो बीजेपी नीत एनडीए सरकार ने कोटा बिल को लेकर आसान राह (न्यायिक लड़ाई) पार कर ली है और बारी है कठिन रास्ते की. वो है इस बिल को मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में फिट करना.हफ्ते भर में लागू हो जाएगा गरीब अगड़ों के लिए 10% आरक्षण, राष्ट्रपति ने दी बिल को मंजूरीकेंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से ऐन वक्त पहले ये लोक-लुभावन ब्रह्मास्त्र चलाया है. चुनाव से पहले सवर्णों की नाराजगी दूर करने के लिए आरक्षण का फैसला लेकर मोदी सरकार ने ये साबित कर दिया कि वो बड़े फैसलों का रिस्क उठाने की ताकत रखती है. इसी के साथ सरकार का ‘सबका साथ-सबका विकास’ का दावा भी मजबूत हो गया. तभी मोदी सरकार के इस फैसले को लोकसभा चुनाव के तहत ‘मास्टर-स्ट्रोक’ माना जा रहा है.सवर्णों को आर्थिक रूप से आरक्षण की मांग पिछले 17 साल से सरकारों के पास लंबित थी. ये एक ऐसा मुद्दा था, जिसे छू कर हाथ जलाने की हिम्मत भी किसी में नहीं थी. हालांकि, संविधान ने समाज में पिछड़े लोगों के लिए जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की है. ये और बात है कि उस व्यवस्था का फायदा वो लोग भी उठा रहे हैं जो आर्थिक रूप से सशक्त और मजबूत हैं.बड़ा सवाल ये है कि देश के संविधान ने मैरिट और समाजिक न्याय का ध्यान रखते हुए 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था को मंजूरी दी है. संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए जातिगत आरक्षण का प्रावधान है. ऐसे में देखने वाली बात होगी कि चुनाव से पहले मोदी सरकार गरीब सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण को कैसे लागू करवाती है?Loading… इस राज्‍य में मिलने लगा है आरक्षण का लाभ, आप भी बनवा लें ये आठ डॉक्‍यूमेंटकोटा बिल को लागू कराने को लेकर बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सवर्ण ही हैं. क्योंकि ये बिल पूरे सवर्णों का नहीं, बल्कि उसके कुछ फीसदी लोगों के लिए है. इसके प्रभाव स्वरूप ‘क्रीमी लेयर’ खुद को गरीब सवर्ण दिखाकर 10 फीसदी आरक्षण में दाखिल होने की पूरी कोशिश करेंगे. यही बात ओबीसी और एससी/एसटी पर भी लागू होती है.सवर्ण कोटा बिल को लागू कराने में दूसरी चुनौती पाटीदार आंदोलन हैं. गुजरात के पाटीगार समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलित हैं. मोदी के गढ़ गुजरात के सौराष्ट्र में हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पाटीदार समुदाय मोदी के खिलाफ माहौल भी बनाने में जुटे हैं. कांग्रेस से हार्दिक की नज़दीकी इसका उदाहरण है.वहीं, इस कोटा बिल के दायरे में गैर-वित्त पोषित उच्च शिक्षण संस्थानों को लाना भी एक बड़ी चुनौती होगी.(लेखिका सीनियर जर्नलिस्ट हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
Source: News18 News

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