कुंभ विशेष: क्या है शाही स्नान और क्यों इसे लेकर साधुओं के बीच खून-खच्चर की नौबत आ जाती है?

मकर संक्रांति पर प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में कुंभ मेले की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. स्नान 15 जनवरी को सवेरे 6 बजे से शुरू होकर शाम 4 बजे तक चलेगा. शाही स्नान की तारीखें और वक्त घोषित किया जा चुका है. तेरह अखाड़ों के साधु-संत संगम पर शाही स्नान करेंगे. शाही स्नान शांति से निबटे, इसके लिए अखाड़ों का क्रम और स्नान के लिए जगह भी तय कर दी जाती है, नहीं तो पहले शाही स्नान के दौरान साधुओं में खून-खच्चर भी हो जाता था. वैसे क्या है ये शाही स्नान और वैराग्य ले चुके साधुओं का इससे क्या वास्ता है, पढ़ें -शाही स्नान की शुरुआतसदियों से ये स्नान चला आ रहा है, जिसमें 13 अखाड़े शामिल होते हैं. ये कोई वैदिक परंपरा नहीं. माना जाता है कि इसकी शुरुआत 14वीं से 16वां सदी के बीच हुई, तब देश पर मुगल शासकों के आक्रमण की शुरुआत हो गई थी. धर्म और परंपरा को मुगल आक्रांताओं से बचाने के लिए हिंदू शासकों ने अखाड़े के साधुओं और खासकर नागा साधुओं से मदद ली.यह भी पढ़ें: कुंभ खत्म होते ही कहां गायब हो जाते हैं नागा साधु? जानिए क्या है नागाओं का रहस्यनागा साधु धीरे-धीरे आक्रामक होने लगे और धर्म को राष्ट्र से ऊपर देखने लगे. ऐसे में मध्यकालीन हिंदू शासकों ने नागा साधुओं के प्रतिनिधि मंडल के साथ बैठक कर राष्ट्र और धर्म के झंडे और साधुओं और शासकों से काम का बंटवारा किया. साधु खुद को खास महसूस कर सकें, इसके लिए कुंभ स्नान का सबसे पहले लाभ उन्हें देने की व्यवस्था हुई. इसमें साधुओं का वैभव राजाओं जैसा होता था, जिसकी वजह से इसे शाही स्नान कहा गया. इसके बाद से शाही स्नान की परंपरा चली आ रही है.यह भी पढ़ें: इस खास वजह से मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ और खिचड़ी खाने का है महत्वLoading… वक्त के साथ शाही स्नान को लेकर विभिन्न अखाड़ों में संघर्ष होने लगा. साधु इसे अपने सम्मान से जोड़ने लगे. उल्लेख मिलता है कि साल 1310 में महानिर्वाणी अखाड़े और रामानंद वैष्णव अखाड़े के बीच खूनी संघर्ष हुआ. दोनों ओर से हथियार निकल गए और पूरी नदी ने खूनी रंग ले लिया. साल 1760 में शैव और वैष्णवों के बीच स्नान को लेकर ठन गई. ब्रिटिश इंडिया में स्नान के लिए विभिन्न अखाड़ों का एक क्रम तय हुआ जो अब तक चला आ रहा है.शाही स्नान में क्या होता हैइसमें विभिन्न अखाड़ों से ताल्लुक रखने वाले साधु-संत सोने-चांदी की पालकियों, हाथी-घोड़े पर बैठकर स्नान के लिए पहुंचते हैं. सब अपनी-अपनी शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करते हैं. इसे राजयोग स्नान भी कहा जाता है, जिसमें साधु और उनके अनुयायी पवित्र नदी में तय वक्त पर डुबकी लगाते हैं. माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में डुबकी लगाने से अमरता का वरदान मिल जाता है. यही वजह है कि ये कुंभ मेले का अहम हिस्सा है और सुर्खियों में रहता है. शाही स्नान के बाद ही आम लोगों को नदी में डुबकी लगाने की इजाजत होती है.ये स्नान तय दिन पर सुबह 4 बजे से शुरू हो जाता है. इस वक्त से पहले अखाड़ों के साध-संतों का जमावड़ा घाट पर हो जाता है. वे अपने हाथों में पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र लिए होते हैं, शरीर पर भभूत होती है और वे लगातार नारे लगाते रहते हैं. मुहूर्त में साधु न्यूनतम कपड़ों में या फिर निर्वस्त्र ही डुबकी लगाते हैं. इसके बाद ही आम जनता को स्नान की इजाजत मिलती है.कल से शुरू होने वाले शाही स्नान के लिए हर अखाड़े को 45 मिनट का समय दिया गया है. इस मौके पर अर्द्धसैनिक बल के जवान तैनात रहेंगे.कल यह होगा स्नान का समय6:15 बजे सुबह महानिर्वाणी, अटल अखाड़ा8:00 बजे सुबह जूना, आवाहन, श्रीपंच अग्नि अखाड़ा11:20 बजे सुबह दिगंबर अनि अखाड़ा13:15 बजे नया उदासीन अखाड़ा7:05 बजे निर्मला अखाड़ा करेगा स्नान10:40 बजे पंच निर्मोही अनि अखाड़ा12:20 बजे निर्वाणी अनि अखाड़ा14:20 बड़ा उदासीन अखाड़ा15:40 बजे सुबह निरंजनी, आनंद अखाड़ायह भी पढ़ें: कुंभ खत्म होते ही कहां गायब हो जाते हैं नागा साधु? जानिए क्या है नागाओं का रहस्य
Source: News18 News

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