भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए खोले थे शिक्षा के दरवाजे

Publish Date:Thu, 03 Jan 2019 08:56 AM (IST)

नई दिल्‍ली, जेएनएन। भारत में महिलाओं की शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर मोदी सरकार कई योजनाएं चला रही है, जिसकी वजह से महिलाएं जागरूक हुई हैं। लेकिन महिलाओं को शिक्षित और अपने पैरों पर खड़ा करने की मुहिम सावित्रीबाई फुले ने 19वीं सदी में ही शुरू कर दी थी। सावित्रीबाई फुले एक समाजसेवी और शिक्षिका थी, जिन्होंने शिक्षा ग्रहण कर ना सिर्फ समाज की कुरीतियों को हराया, बल्कि भारत में लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने का काम किया।
सावित्रीबाई फुले ने कई बाधाओं को पार करते हुए स्त्रियों को शिक्षा दिलाने के अपने संघर्ष में बिना धैर्य खोये और आत्मविश्वास के साथ डटी रहीं और सफलता प्राप्त की। सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा के साथ मिलकर उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, शिक्षा छुआछूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह तथा विधवा-विवाह जैसी कुरीतियां और समाज में फैले अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष किया। सावित्रीबाई फुले का जन्म तीन जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में हुआ था। सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिराव फुले ने भारत में महिला शिक्षा की नींव रखी थी। दोनों ने पहली बार 1848 में पुणे में देश का पहला आधुनिक महिला स्कूल खोला था। सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने जातिवाद, छुआछूत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी।

सावित्रीबाई का जन्म एक धनी किसान परिवार में हुआ था। 1940 में नौ साल की उम्र में उनका विवाह 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हुआ। सावित्रीबाई और ज्योतिराव की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने यशवंतराव को गोद लिया था। सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना उनके पति ज्योतिराव ने सिखाया था। सावित्रीबाई फुले ने पति के साथ मिलकर पुणे में महिला स्कूल खोला और उसमें टीचर के रूप में काम करने लगीं। बाद में सावित्रीबाई ने अछूतों के लिए भी स्कूल खोला।
शिक्षा ग्रहण करने के बाद सावित्री बाई ने अन्य महिलाओं को भी शिक्षित करने का जिम्मा उठाया और ज्योतिबा के साथ मिलकर 1848 में पुणे में बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसमें कुल नौ लड़कियों ने दाखिला लिया और सावित्रीबाई फुले इस स्कूल की प्रधानाध्यापिका बनीं। इसके बाद रास्ते आसान होते चले गए और उन्होंने भारत में लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा के अधिकार के साथ अन्य मूलभूत अधिकार दिलाने की भी लड़ाई लड़ी।

आजादी के पहले पुणे बॉम्बे प्रेसिडेंसी में स्थित था। ब्रिटिश शासकों ने फुले दंपति की समाज सुधार के कार्यक्रम चलाने में मदद की। उन्नीसवीं सदी में हिंदुओं में बाल विवाह काफी प्रचलित था। मृत्यु दर अधिक होने के कारण कई लड़कियां बाल विधवा हो जाती थीं। सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओं के कारण विधवा लड़कियों का विवाह नहीं हो पाता था। फुले दंपति ने बाल विवाह के खिलाफ भी सुधार आंदोलन चलाया। कहा जाता है कि फुले दंपति ने जिस यशवंतराव को गोद लिया था। वो एक ब्राह्मण विधवा के बेटे थे।
सावित्रीबाई ने 1897 में अपने बेटे यशवंतराव के संग मिलकर प्लेग के मरीजों के इलाज के लिए अस्पातल भी खोला था। पुणे स्थित इस अस्पताल में यशवंतराव मरीजों का इलाज करते और सावित्रीबाई मरीजों की देखभाल करती थीं। मरीजों की देखभाल करते हुए वो खुद भी इस बीमारी की शिकार हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका देहांत हो गया।

Posted By: Tilak Raj

Source: Jagran.com

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