क्रांति नहीं, वोट बैंक की सियासत का जरिया है नक्सलवाद

Publish Date:Thu, 03 Jan 2019 10:28 AM (IST)

रायपुर, नईदुनिया। पश्चिम बंगाल और बिहार में नक्सलवाद की कमर टूटने के बाद जान बचा कर भागे नक्सलियों ने 40 साल पहले छिपने के लिए बस्तर संभाग के जंगलों को चुना। सात-सात सदस्यों वाले सात समूह (ग्रुप) जंगलों (वनों) में दाखिल हुए। उनका इरादा यहां क्रांति करने का नहीं, बल्कि सुरक्षाबलों से जान बचाने का था। कई साल तक उनकी गतिविधियां सीमित रहीं। कुछ वर्षो बाद राजनीति (राष्ट्रीय-क्षेत्रीय) ने नक्सलियों को क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने का मौका दिया।
हिंसा की तमाम वारदातों व फोर्स की कार्रवाई के बावजूद बस्तर के जंगलों में अब भी धमाके होते हैं। अर्धसैन्य बलों के 70 हजार जवानों की तैनाती होने पर भी नक्सलवाद काबू में नहीं है। वनों में नक्सलियों की वास्तविक संख्या कितनी है इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जाता है। आज उनकी ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि वे दंडकारण्य (छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, सीमांत आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओड़िशा व महाराष्ट्र के जंगल) को आधार बनाकर देश में क्रांति का दावा कर रहे हैं।

लब्बोलुआब यह कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद राजनीतिक दलों के लिए वोटबैंक की सियासत का जरिया है। इस समस्या से निपटने की सरकारों की नीतियां समान ही रही हैं पर इस बार कांग्रेस की सरकार नक्सल नीति बदलने के वादे के साथ सत्ता में आई है। 2013 में चुनाव के पहले नक्सलियों ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल समेत कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की हत्या कर दी थी। इस बार चुनाव प्रचार पर आए कांग्रेस नेता राजबब्बर ने नक्सलियों को क्रांतिकारी बता दिया। इसका फायदा भी हुआ, कांग्रेस बस्तर की 12 में से 11 सीटें जीत गई।
1980 में बस्तर पहुंचे नक्सली

नक्सल मामलों के जानकार शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं कि 1980 में बारिश के बाद बंगाल और बिहार से नक्सली नेता सात-सात सदस्यों के समूह (ग्रुप) में बस्तर के जंगलों में घुसे। वर्षों उनकी गतिविधियां सीमित रहीं। 1990 में भाजपा सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ जन जागरण अभियान चलाया। पुलिस ने नक्सलियों के मददगार आदिवासियों पर सख्ती की। पुलिस से बचने के लिए कई आदिवासी युवा हथियार उठाकर नक्सली संगठन में शामिल हो गए। यह बेहद अजीब है कि यहां नक्सलवाद है पर क्रांति नहीं है।
चुनाव में नक्सलियों का प्रभाव

बस्तर संभाग की सात विधानसभाओं बीजापुर, दंतेवाड़ा, कोंटा, नारायणपुर, कोंडागांव आदि में नक्सलियों का सीधा प्रभाव है। स्थानीय नेताओं की हत्या की बहुत सी घटनाएं सामने आई हैं। नक्सलियों के फरमान पर गांवों के सरपंच सामूहिक इस्तीफा देते रहे हैं। हालांकि वे चुनाव और लोकतंत्र के बहिष्कार की बात कहते हैं लेकिन हकीकत यह है कि उनके इलाकों में इस बार विधानसभा चुनाव में जमकर वोटिंग हुई थी।
बिगड़े हुए बेटे या अपराधी

नक्सलवाद से निपटने की सरकारों की नीति बड़ी गड्डमड्ड रही है। पिछली भाजपा सरकार ने 15 साल में सलवा जुड़ूम से लेकर ऑपरेशन ग्रीन हंट तक चलाया। नक्सली खत्म होने के दावे किए गए। कभी उन्हें बिगड़ा हुआ बेटा बताया गया तो कभी कहा गया गोली का जवाब गोली से ही देंगे। बस्तर में फोर्स का शिकंजा लगतार कसता रहा लेकिन वे खत्म हो गए हों ऐसा कभी नहीं हुआ। अब कांग्रेस नक्सलियों से बातचीत की हिमायत कर रही है। यह भी कहा जा रहा है कि गोली चली तो जवाब तो देंगे। फोर्स हटाई नहीं जाएगी। जाहिर है कि बातचीत कैसे होगी यह अभी तय नहीं है।
सरकार के लिए आसान न होगा

नक्सलवाद पर नई नीति क्या होगी यह अभी तय नहीं है, बस्तर के आदिवासी विधायक मानते हैं कि बंदूक से हल नहीं निकलेगा। कांग्रेस नक्सलियों से बात करे, निरपराध आदिवासियों को जेल से रिहा करने जैसे वादे करके आई है। आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने की कांग्रेस और भाजपा की नीति समान रही है। नक्सलियों को सबक सिखाने की नीति पर चलती रही कांग्रेस अब इस मुद्दे को नई नीति से हल करना चाहती है। पार्टी किस दिशा में जाएगी यह देखा जाना बाकी है, लेकिन नक्सलियों से बातचीत की पहल की घोषणा से ही भाजपा हमलावर है। भाजपा नेता कह रहे हैं कि इतने सालों में लंबी लड़ाई करके हम उन्हें नेस्तनाबूद करने की कगार पर थे, अब कांग्रेस सब मटियामेट करने पर तुली है।
Posted By: Arti Yadav

Source: Jagran.com

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