सावित्रीबाई फुले: स्कूल जाने पर पड़ते थे पत्थर, फिर भी खोला महिलाओं के लिए स्कूल

India oi-Mrinal Sinha |

Published: Thursday, January 3, 2019, 10:26 [IST]
नई दिल्ली। आज ही के दिन 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गांव में जन्मी थीं सावित्रीबाई फुले। एक समाजसेवी, एक शिक्षिका जो भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाज में न सिर्फ लड़कियों के हक के लिए लड़ीं बल्कि उनके लिए शिक्षा के रास्ते भी खोल दिए। महज 9 साल की उम्र में बाल विवाह का शिकार हुईं सावित्री को पढ़ाई न कर पाने का दुख हमेशा से था। लेकिन जिस ज्योतिबा फुले से उनकी शादी हुई थी वह उनके विचारों का सहयोग करते थे। पढ़ना चाहा तो घरवालों ने दिखाया बाहर का रास्ता ऐसे में जब सावित्रीबाई शादी के बाद ज्योतिबा को खाना देने खेत में आती थीं, उस दौरान वे सावित्रीबाई को पढ़ाते थे, लेकिन इसकी भनक उनके पिता को लग गई और उन्होंने रूढ़िवादीता और समाज के डर से ज्योतिबा को घर से निकाल दिया। इसके बाद भी उनके हौंसले नहीं टूटे और न ही ज्योतिबा के। उन्होंने सावित्री को पढ़ाना जारी रखा और प्रशिक्षण विधालय में उनका दाखिला भी करा दिया। कहा जाता है कि जब सावित्री स्कूल जाती थीं तो लोग उनपर पत्थर फेंका करते थे। लेकिन उन्होंने इसका जरा भी असर खुद पर नहीं पड़ने दिया। महिलाओं की शिक्षा के लिए लड़ी लंबी लड़ाई समाज के तानों के बावजूद सावित्रीबाई नहीं टूटींं और अपनी पढ़ाई पूरी की। सावित्री यहीं नहीं थमीं। बल्कि उन्होंने बाकी महिलाओं को शिक्षित करने की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर ले ली। अपने पति ज्योतिबा के साथ मिलकर उन्होंने 1848 में पुणे में बालिका विधालय की स्थापना की। सावित्री के स्कूल में केवल 9 लड़कियों ने लिया दाखिला सावित्री ने खूब जी जान लगाकर जो पहल की उसका नतीजे बहुत अच्छा नहीं था। उनके इस स्कूल में केवल 9 लड़कियां पढ़ने आईं। सावित्री स्कूल की प्रधानाध्यापिका बन गईं। हालांकि बाद में उनके रास्ते आसान हुए और उन्होंने महिलाओं के शिक्षा के अधिकार की लड़ाई भी लड़ी। इतना ही नहीं बल्कि सावित्री छुआछूत, बाल विवाद, सती प्रथा जैसी समाज की कुरीतियों के खिलाफ लड़ीं भीं और काफी हद तक जीती भी। इस सब के लिए सावित्री को आज भी याद किया जाता है।

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Source: OneIndia Hindi

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